भै भूखो, मैं सेती -भिटौली की कहानी

उत्तराखण्ड में चैत (चैत्र) का महीना लग गया है. कुमाऊं में चैत के महीने में विवाहित बहनों व बेटियों को भिटौली देने की विशिष्ट सांस्कृतिक परम्परा है. चैत के पहले दिन बच्चे फूलदेई का त्यौहार मनाते हैं लेकिन यह महीना मुख्य रूप से विवाहित बहन-बेटियों को भिटौली देने का है. भिटौली का शाब्दिक अर्थ भेंट देने से है. जिसके तहत चैत के महीने में विवाहित बेटियों को मायके की ओर से भिटौली में पकवान के रूप में पूरी, हलवा, खीर, खजूरे, पुए, बढ़े, गुड़, मिश्री, मिठाई आदि दिये जाते हैं. पकवान के साथ वस्त्रों में साड़ी, ब्लाउज व रुमाल आदि मुख्य तौर पर दिये जाते हैं. मायके वालों में सामर्थ्य हो तो आभूषण भी दिये जाते हैं. भिटौली आमतौर पर पिता, भाई ही लेकर जाते हैं. भिटौली के रूप में मायके से आये पकवानों को बहन, बेटियां अपने ससुराल के हर घर में बांटती है. इससे पूरे गांव को यह पता भी चल जाता है कि किसकी भिटौली आ गयी है और किसकी अभी आनी है.

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